छोटी, प्यारी, मगर मुक्त है क्या? काव्य शिल्प और मुक्त उड़ान के कुछ आधार

किसी कमाल हायकू का सा असर है, केदारनाथ अग्रवाल की इस छोटी सी रचना में। पर यह हायकू नहीं है। शायद सरल साधारण मुक्त कविता है?

अच्छा विधा की बात बाद में करेंगे, पहले रचना का रसास्वादन तो करें!

आज नदी बिलकुल उदास थी।
सोयी थी अपने पानी में,
उसके दर्पण पर –
बादल का वस्त्र पड़ा था।
मैंने उसे नहीं जगाया,
दबे पाँव घर वापस आया।

~ केदारनाथ अग्रवाल

हुआ न असर? इतने से शब्द में एक स्पष्ट चित्र खिंच गया, और चित्र एक विस्तृत एहसास में बदल गया। एक पल, अनन्त की गहराई लिए ― ठीक वैसे जैसे एक माहिर कवि की हायकू अपनी डिबिया में छिपाए रखती है। पर यह हायकू नहीं है!

“वाणी, यह क्या हो गया है आपको? यह तो सभी को दिख रहा है कि यह हायकू नहीं है।”

ओह! तो क्या यह बस एक मुक्त कविता है? कवि ने अपनी बात कह दी और बस किसी चमत्कार से हम पर असर हो गया?

“जी ‘गागर में सागर’ कहते हैं हमारे यहाँ। बाकि हमें क्या करना कि यह ‘क्या’ कविता है! यह कवियों का होता है कुछ — ‘अन्दाज़े-बयां’ वगैरह…”

कुछ तो रहस्य है। कैसे हो जाता है असर? क्या है यह चमत्कार? मेरा मन कह रहा है, कुछ तो है जिसके कारण यह पंक्तियाँ मुझे खींच लेती हैं। बस “अन्दाज़े-बयां” नहीं है।

आह! गीत गतिरूप ने कुछ नक़ाब हटाए! इन पंक्तियों में एक अदृश्य लय छिपा है। इसी के स्पन्दन से यह पंक्तियाँ अप्रत्यक्ष मेरे मन में प्रतिध्वनित हो रही हैं।

आज नदी - पंक्तियों को अलग तरह से तोड़ें - उसका गतिरूप

सोलह मात्राओं का लय – काव्य, संगीत, नृत्य में सबसे ज्यादा प्रयोग होता है। तबला पर इसे “तीनताल” कहते हैं। हमारा मन बड़ी सहजता से इसे ग्रहण कर लेता है। कभी कभी तो हमें पता भी नहीं चलता कि वह हममें गूंज रहा है, जैसे कि इस रचना में।

यहाँ पहली चार पंक्तियों में कोई तुक भी नहीं, और बीच में तो लय काफी टूट भी रहा है — इसी से रचना छन्द बद्ध नियमों से मुक्त लगती है। लगता है कवि ने बस अपनी बात कह दी — बात सुन्दर है, दृश्य सुन्दर है, तो हो गया असर।

पर कवि ने बस ऐसे ही नहीं कह दिया। इस मुक्त उड़ान का भी आधार है। लय पाठक के मन में अनुभूति को प्रतिध्वनित करने की, पंक्तियों को प्रवाह देने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जो पंक्तियाँ लय में हैं, उनका तो हमारे अवचेतन पर असर हो ही रहा है — बीच में जहाँ लय टूट रहा है, सोलह मात्रा के छंद में से, आठ मात्रा, अर्थात आधी पंक्ति गायब हैं, उसका भी खास असर है। पहली बात 16 से ठीक आधा, 8 मात्रा गायब है, 3 नहीं, 6 या 7 नहीं। पढ़ने के दौरान स्वाभाविक रूप से वहाँ कुछ खाली खाली सा रह जाता है। इस आधी अदृश्य पंक्ति में कवि मौन को भी स्पष्ट आसन दे रहा है और हमें पता नहीं चलता मगर उस मौन से निहित एहसास और गहरा जाता है।

यह छंद टूटी पंक्तियों में कवि ने अगली पंक्ति कहाँ शूरु की है, उसके भी अर्थ हैं। पहली पंक्ति “उसके दर्पण पर” के बाद पाठक स्वाभाविक रूप से दो क्षण रुकता है, नदी के दर्पण को आत्मसात करता है, फिर “बादल का वस्त्र पड़ा था” से अगली बात, अगला दृश्य, अगली अनुभूति प्रस्तुत की जाती है। अगर हम सजग होकर पंक्तियों को ग्रहण करेंगे, तो मन के अन्दर यह क्रिया छोटे से चलचित्र के जैसे घटती नज़र आएगी।

काव्य में लय, प्रवाह की महत्वपूर्ण भूमिका है, मगर सिर्फ़ वह ही सबकुछ नहीं है। सिर्फ़ लय पर ध्यान दें तो कवि शब्दों को इस प्रकार सजा सकता था

उसके दर्पण
पर बादल का
वस्त्र पड़ा था
आज नदी - पंक्तियों को अलग तरह से तोड़ें - उसका गतिरूप

इस प्रकार से बात ठिठक कर पाठक तक पँहुचती है, अनुभूति और दृश्य गायब हो जाते हैं। हर पंक्ति का अपने में कोई अर्थ नहीं रह जाता है।

जैसे शिल्पकार पत्थर तराशता है, कवि व गीतकार समय तो तराश कर उसमें शब्दों को जड़ देता है। उद्देश्य – अनुभूति का सम्प्रेषण जो पाठक के मन में सुगन्ध की तरह फैल जाए। लोग कहते हैं कविता तो भावना की मुक्त धारा है, उसे बस बहने दो। हाँ, ज़रूर, पहले ड्राफ़्ट में बस लिख डालो जो भी शब्द बह रहे हैं। पर फिर वह अभिव्यक्ति पाठक के हृदय में भी सहज स्पन्दित होती है कि नहीं यह शिल्प की बात है। विधा चाहे जो भी हो, रचना चाहे जितनी भी लम्बी या छोटी हो। पहली बार में जो लिख दिया वही कविता नहीं बन जाती। कवि अपने पहले ड्राफ़्ट को शिल्प के नज़रिए से बार बार तराशता है, जबतक कि हर शब्द को स्पष्ट आसन न मिल जाए, जबतक कि सभी अतिरिक्त शब्दों को झाड़ कर हटा न दिया जाए। तब रचना उभर कर बाहर आती है।

***

लेख में चित्र और मात्रा गणना गीत गतिरूप के द्वारा किया गया है। गीत गतिरूप कवि को अपनी कविताओं का शिल्प तराशने में मदद करता है।

मुक्त कविता की उड़ान पर आप भी अपना अनुभव साझा करें, कवि के जैसे भी, और पाठक के जैसे भी। कोई कविता आपपर क्यों असर करती है उसपर अपने विचार नीचे कमेन्ट में साझा करें।

काव्य शिल्प में शब्द संयोजन का मेरा एक अनुभव

“आज यूनिफॉर्म आयरन नहीं हो सका? कोई बात नहीं। तुम यहाँ खड़ी हो जाओ सीता। कपड़े ढक जाएँगे, पर चहरा स्पष्ट नज़र आएगा। राधिका तुम मॉनिटर हो, सामने की पंक्ति मे आ जाओ। लम्बी हो इसलिए तुम्हे बैठना होगा।”

क्लास फोटो के पहले सारे बच्चों के लिए ठीक ठीक जगह तय करना बड़ा पेचीदा काम है। अक्सर कविता की एक पंक्ति मे भी कौन से शब्द कहाँ रखे जाएं, यह संयोजन या तो पंक्ति को सरसता प्रदान करती है, या एक चुभते कंकड़ का आभास छोड़ जाती है। छन्द मात्रा सही हो, वही चार-पाँच शब्द, पर किसे कौन सी कुर्सी मिले जिससे कि पंक्ति कानों को सहला जाए – यह तय करने में शब्दों में फेर बदल करना जरूरी होता है। इस आधी अधूरी रचना में एक पंक्ति ने ऐसे ही मुझे तंग किया, एक छोटे से अस्पष्ट कंकड़ का आभास होता रहा –

यह नियम है – शाम ढलती है।
दु:ख के आँचल का लहराना
यह भी मन का अटल नियम है।

ऐसे मत हो –
दिन तो भाए पर, रात ढले ना सहन करो।
अपने हथियार रख दो सारे
पोषण लेकर आई रात,
कुछ पल यह भी ग्रहण करो।

वह कष्टदायक पंक्ति थी
अपने हथियार रख दो सारे

बहुत देर तक समझ में नहीं आया, पढ़ने में कहाँ अड़चन आ रही है। फिर दिखा – “हथियार” का र और “रख” का र मिल रहें हैं और पढ़ने में दोनों शब्द का स्पष्ट उच्चारण नहीं हो पा रहा है।

तो दूसरी बार पंक्ति यह बनी,
अपने हथियार सारे रख दो

अब “हथियार” और “रख” अलग अलग हो गए, पढ़ते वक्त कानों को कुछ राहत मिली, पर अब “सारे” और “रख” पास पास थे – रे और र। र और र से तो यह बेहतर था फिर भी पढ़ते वक्त जीभ पूरी तरह से खुश नहीं थी।

फिर काव्य की देवी ने तीसरा रूप धरा
रख दो अपने हथियार सारे

इस संयोजन में कुछ तो आकर्षक है – पढ़ते वक्त स्वत: ही हथियार के “या” पर ज़ोर पड़ रहा है जिससे कि शायद अभिव्यक्ति कुछ सशक्त हुई है। अब पंक्ति को अपने पड़ोसियों के संग पढ़ते हैं –

दिन तो भाए पर, रात ढले ना सहन करो।
रख दो अपने हथियार सारे
पोषण लेकर आई रात,

फिर कुछ खटक रहा है। बात यह है कि हमारी पंक्ति में 2 2 मात्रा के संयोजन में हथियार का र बेचारा चिपट गया है।

यहाँ दो बातें महत्वपूर्ण हैं –

  1. जब विषम मात्राओं की पंक्ति हो, जैसे 15, 17, 19 – तो आखरी अक्षर अकेले एक मात्रा का बचे तो बेहतर है। यहाँ 17 मात्रा की पंक्ति का अन्त 2 मात्रा से हो रहा है – “सारे” के “रे” से।
  2. पंक्ति के बीच में विषम मात्रा के शब्द को जितनी शीघ्रता से पास के शब्द से एक मात्रा मिल जाए, उतना बेहतर है – जिससे कि विषम सम हो सके। जैसे कि “प्यार नहीं” और “नहीं प्यार” के बीच “प्यार नहीं” में ज्यादा लय है।

तो इस तरह से आखिरकार पंक्ति ने रूप लिया –
रख दो अपने सारे हथियार

अगली पंक्ति के संग देखें तो
रख दो अपने सारे हथियार
पोषण लेकर आई रात

अब हथियार का यार और रात दोनों 2+1 से समाप्त हो रहे हैं तो कानों को कुछ और सुकून मिल रहा है – और रचना ने यह रूप लिया

यह नियम है – शाम ढलती है।
दु:ख के आँचल का लहराना
यह भी मन का अटल नियम है।

ऐसे मत हो –
दिन तो भाए पर, रात ढले ना सहन करो।
रख दो अपने सारे हथियार –
पोषण लेकर आई रात,
कुछ पल यह भी ग्रहण करो।

इस लेख में मात्राओं के चित्र गीत गतिरूप के सहयोग से बनाए गए हैं। गीत गतिरूप एक सॉफ़्टवेयर है जो काव्य-शिल्प संवारने में कवि की मदद करता है। कविता में शब्द संयोजन के आपके अनुभव और विचार भी हमारे संग नीचे कमेन्ट्स में साझा करें।

अजीब मानूस अजनबी था…

गये दिनों का सुराग़ ले कर किधर से आया किधर गया वो
अजीब मानूस अजनबी था, मुझे तो हैरान कर गया वो
– नासिर क़ाज़मी ( http://swatisani.net/asad/ से )

अभी पढ़ा यह शेर। एक उतार चढ़ाव है इसकी पंक्तियों में जो मुझे मोहक लगीं। तो मैंने इसे गीत गतिरूप में डाल कर देखा –

33 मात्राओं की पंक्तियाँ मिली, 16+17 की जोड़ी में, जो अक्सर देखने को नहीं मिलती। और ऊपर नीचे के अक्षर कहीं एक दूसरे को काटते नहीं। ए-कार अक्सर ग़ज़ल में छोटा उच्चारण किया जाता है – मगर उसकी भी यहाँ कहीं आवश्यकता नहीं। वैसे उर्दू ग़ज़ल के मापदण्ड शायद कुछ और हैं (मात्रा नहीं) और 33 33 होने से ही मोहक उतार चढ़ाव नहीं होता – पंक्ति के अन्दर की शिल्प की भी बात है।

शेर का संदेश तो मोहक है ही!

नई सुविधा – ग़ज़लकारों के लिए

दोस्तो,

अब गीत गतिरूप ग़ज़ल का रदीफ़ और काफ़िया का अनुमान कर बता सकता है| आप अगर ग़ज़ल विधा सीख रहे हैं या सिखा रहे हैं तो यह सुविधा आपके ख़ास काम आ सकती है| ग़ज़ल के शिल्प के विषय में आप यहाँ पढ़ सकते हैं – Basic Structure of Hindi Poetry Part 4: Correspondence with Urdu Poetry.

यह सुविधा इस लेख के आधार पर ही बनाई गयी है| इस सुविधा का प्रयोग ऐसे करते हैं –

रचना को रचना के बॉक्स में डालें या टाइप करें – उदाहरण स्वरुप हम ग़ालिब का एक ग़ज़ल लेते हैं –

और हमेशा कि तरह “प्रतिरूप देखें” बटन दबाइए

हमेशा की तरह गीत गतिरूप का नतीजा दिखेगा –

आप अगर रचना का ग़ज़ल के जैसे विश्लेषण करना चाहते हैं तो “ग़ज़ल” चेकबॉक्स को चेक करें –

गीत गतिरूप रदीफ़ और काफ़िया का अनुमान लगाकर दिखाएगा – रदीफ़ नीले में (“नहीं आती”) और काफ़िया हलके हरे में (“बर”, “ज़र”, “भर” इत्यादि) –

किसी भी रचना की तरह आप यहाँ भी अक्षरों का मात्रा निर्धारण उच्चारण के अनुसार एडजस्ट कर सकते है| ऐसा करने पर ग़ज़ल का यह प्रतिरूप बनता है –

मात्राओं को उच्चारण के अनुसार एडजस्ट करने की सुविधा ख़ास उर्दू और उर्दू प्रेरित रचनाओं के लिए है| इसे इस विडियो में विस्तार से समझाया गया है|

रदीफ़ और काफ़िया का अनुमान गीत गतिरूप मतला (ग़ज़ल की पहले शेर, पहली दो पंक्ति) से लगाता है| इसके अनुसार वह बाकी सभी शेर के दुसरे मिसरे (पंक्ति) में रदीफ़ और काफ़िया खोजता है| इसीलिए यह अनिवार्य है कि रचना के बॉक्स में पहली दो पंक्तियाँ मतले की ही हो और शेष पंक्तियाँ भी ग़ज़ल के अनुसार हो – और कोई अक्षर या कैरक्टर न हो, पूर्णविराम भी नहीं, और हर शेर एक एक पंक्ति खाली छोड़ कर हो|

एक उदाहरण और लेते हैं, दुष्यन्त कुमार की ग़ज़ल “हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए”| मतला के आधार पर रदीफ़ “चाहिए” है और काफ़िया “पिघलनी”, “निकलनी” है| मगर ग़ज़ल के अन्य शेर में काफ़िया पूरी तरह से नहीं मिल रहा| जितना मिल रहा है उसे ही हलके हरे रंग में दिखाया गया है|

कवि के लिए शब्द सम्पदा

दोस्तो,

कवि की शब्द सम्पदा जितनी विशाल होती है, उसके मन के अनुकूल सटीक अभिव्यक्ति की संभावनाएं उतनी विस्तृत होती है| कवि के लिए सही शब्द ढूँढना अत्यन्त आवश्यक है| अब गीत गतिरूप में कविता लिखते लिखते, सही शब्द ढूँढने में आप नई सुविधा “शब्द सम्पदा” की मदद ले सकते हैं|

जो भाव के आप शब्द ढूँढ रहे हों, उसका कोई एक शब्द गीत गतिरूप के मुख्य स्क्रीन में इस बॉक्स में लिखें और “समानार्थक शब्द” बटन दबाएँ|

शब्द सम्पदा का स्क्रीन खुलेगा और शब्द अगर हमारे डेटाबेस में होगा तो उसके समानार्थक और शब्द दिखेंगे| कई बार एक शब्द का अलग अलग भाव या अर्थ में प्रयोग होता है| यह अलग भाव और भाव के अन्य शब्द अलग ग्रुप में दिए होंगे|

शब्द सम्पदा के स्क्रीन में पुनः कोई और शब्द खोज सकते हैं| जब ज़रुरत हो इसे बन्द कर कविता लिखने के बॉक्स में पुनः लौट सकते हैं|

शब्द सम्पदा और गीत गतिरूप का प्रयोग करने के लिए यहाँ क्लिक करें|

कोई भी शब्दकोश बनाना बहुत ही श्रमसाध्य काम है और समानार्थक शब्दों का कोश तो और भी ज्यादा| यह सुविधा आई-आई-टी मुम्बई, कम्प्युटर विभाग का Center for Indian Language Technology के शोध कार्य, उनकी प्रोजेक्ट “हिन्दी वर्ड-नेट” से सम्भव हुआ है| अभी डेटाबेस में जो भी शब्द और विकल्प है, उन्ही का संकलन है| हमारा प्रयास रहेगा कि इसे और आगे ले जाएं, और उपयोगी बनाएं|

जन कल्याण और शैक्षिक भाव को कायम रखते हुए शब्द सम्पदा का सारा कोड GNU GPL License के अन्तर्गत GitHub पर उपलब्ध है जिससे कि अन्य लोग भी इस प्रोजेक्ट में योगदान दे सकें और इसे आगे ले जा सकें|

शब्द सम्पदा का प्रयोग कर बताइयेगा आपको कैसा लगा|

आपकी सृजन-यात्रा के लिए समस्त शुभ कामनाओं सहित

वाणी मुरारका

आपकी रचनाएँ – लिखते लिखते सुरक्षित

दोस्तों, गीत गतिरूप में अब एक और नई सुविधा उपलब्ध है| अब गीत का गतिरूप देखने के संग संग आपकी रचना आपके खाते में सर्वर पर सेव (सुरक्षित) भी हो जाती है| इससे आप गीत गतिरूप में अपनी पिछली रचनाएँ भी पा सकते हैं, उन्हें खोल कर पुनः देख सकते हैं, कुछ बदलना हो तो बदल कर, या उसे आगे और बढ़ा कर पुनः सुरक्षित कर सकते हैं|

अगर आप गीत गतिरूप का अक्सर प्रयोग करते हैं तो गीत गतिरूप आपका ऑनलाइन नोटबुक जैसा बन सकता है जहां आपकी रचनाएँ, आधी अधूरी, सम्पूर्ण परिष्कृत, सभी प्रकार की एक जगह जमा है जो आप कभी भी पुनः देख सकते हैं, खोल सकते हैं|

गीत गतिरूप के मुख्य पृष्ठ पर, जहाँ आप कविता लिखते हैं, अब यह लिंक उपलब्ध है – “मेरी पिछली कवितायें” (अंग्रेज़ी में My Saved Poems)

इस लिंक पर क्लिक करने से आप “मेरी कवितायें” पृष्ठ पर पहुंचेंगे| यहाँ आप अपनी जमा की हुई रचनाओं के प्रारम्भिक शब्द सूचीबद्ध पायेंगे|

आप अगर कोई रचना पुनः खोल कर देखना चाहते हैं, उसपर आगे काम करना चाहते हैं तो, बायीं ओर “खोलें” बटन (1) पर क्लिक करें

रचना पुनः गीत गतिरूप के बॉक्स में आ जायेगी, जहाँ आप फिर से उसका गतिरूप देख सकते हैं, उसमें संशोधन कर पुनः उसे सेव कर सकते हैं| उदारहण स्वरुप मैंने ऊपर सूची में पहले “खोलें” बटन को क्लिक किया और रचना गीत गतिरूप के बॉक्स में खुल गया| जब भी आप “प्रतिरूप देखें” बटन दबाते हैं, छवि दिखाने के संग संग रचना सर्वर में जमा भी हो जाती है|

अपनी रचनाओं की सूची में अगर आपको कोई रिकॉर्ड नहीं चाहिए तो “मिटायें” (चित्र में 2) बटन दबा कर अपनी सूची को परिष्कृत कर सकते हैं| अगर सूची में से किसी भी रिकॉर्ड के साथ कुछ नहीं करना है, बस पुनः गीत गतिरूप के मुख्य पृष्ठ पर जाना है तो “पुनः लिखने के पन्ने पर” (अंग्रेज़ी में Back To Writing Page) लिंक पर क्लिक कर सकते हैं (चित्र में 3)
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वैसे गीत गतिरूप के किसी भी पृष्ठ में ऊपर बायीं ओर गीत गतिरूप के लोगो (logo) पर क्लिक करके आप मुख्य लिखने के पन्ने पर लौट ही सकते हैं|

गीत गतिरूप में आपकी रचनाएँ सिर्फ आपके लिए हैं| इन्हें किसी और व्यक्ति के संग बाँटा नहीं जाएगा, किसी और को पढ़ने के लिए नहीं दिया जाएगा| बल्कि कोई रचना अगर आपके गीत गतिरूप खाते में जमा होती है इससे यह साबित नहीं होता कि वह आपकी ही रचना है| यह इसलिए क्योंकि अपनी लेखनी को सुधारने के लिए गीत गतिरूप का प्रयोग तो हम करते ही हैं, साथ ही साथ किसी भी अन्य कवि की रचना भी हम गीत गतिरूप में डाल कर देख सकते हैं, उसके लय, छंद आकार को और समझने के लिए|

तो आइये यह नई सुविधा का प्रयोग करें और अपनी राय, सुझाव, प्रश्नों के साथ हमसे ज़रूर संपर्क करें|

आपकी सृजन यात्रा में गीत गतिरूप आपका साथी, आपका सहायक बन सके, यही हमारा उद्देश्य है|

कई गीत कई रूप

काव्य कला को बेहतर जानने के लिए कई रचनाओं को विश्लेषणात्मक नज़रिए से देखना अनिवार्य है|

काव्यालय पर कविताओं का अब गतिरूप भी हम कविता के पास देख सकते हैं| उदाहरण स्वरुप, यह कुछ कवितायें हैं जो हाल में काव्यालय पर प्रकाशित की गई हैं| कविता के अंत में दाहिनी ओर उसका गतिरूप भी उपलब्ध हैं –

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आपको आमन्त्रण है – इन लिंक पर पधारें और इन गीतों का पूरा गतिरूप देखें| आपको ज़रूर रुचिकर लगेंगी|

अगर आगे भी काव्यालय पर प्रकाशित होती रचनाओं की सूचना आप पाना चाहते हैं तो यहाँ अपना ईमेल दाखिल करें|

वर्ष २०१६ आपके लिए आनन्द भरे गीत लाए – इस शुभ कामना सहित –

वाणी मुरारका

लड़कियां किस लय पर थिरकती हैं – कविता छंद विश्लेषण

हाल ही में काव्यालय पर सुदर्शन शर्मा की कविता लड़कियाँ प्रकाशित हुई। कविता पढ़ कर मुझे एक लय का एहसास हुआ। जबकि यह स्पष्ट है कि यह छंदोबद्ध कविता नहीं है और होना भी नहीं चाह रही है …

हाल ही में काव्यालय पर सुदर्शन शर्मा की कविता लड़कियाँ प्रकाशित हुई। कविता पढ़ कर मुझे एक लय का एहसास हुआ।

आपने अगर नहीं पढ़ी है कविता तो पहले उसका रस ले लें, फिर आगे बात करते हैं| अगर पढ़ी है, तो सीधे यहाँ मुद्दे पर आइये|

लड़कियाँ

कहाँ चली जाती हैं
हँसती खिलखिलाती
चहकती महकती
कभी चंचल नदिया
तो कभी ठहरे तालाब सी लड़कियाँ

क्यों चुप हो जाती हैं
गज़ल सी कहती
नग़मों में बहती
सीधे दिल में उतरती
आदाब सी लड़कियाँ

क्यों उदास हो जाती हैं
सपनों को बुनती
खुशियों को चुनती
आज में अपने कल को ढूंढती
बेताब सी लड़कियाँ

कल दिखी थी, आज नहीं दिखती
पंख तो खोले थे, परवाज़ नहीं दिखती
कहाँ भेज दी जाती हैं
उड़ने को आतुर
सुरख़ाब सी लड़कियाँ

– सुदर्शन शर्मा


कविता के ढांचे में कुछ बातें तो स्पष्ट हैं, जो लय का एहसास देती हैं –

  • पाँच पंक्तियों का हर छंद
  • हर छंद में पहली पंक्ति एक दुखद प्रश्न उठाती है, कि एक सुन्दर सा चित्र कहाँ खो गया
  • बाकि की चार पंक्ति वह सुन्दर चित्र खींचती हैं (जो खो गया)
  • हर छंद “आब सी लड़कियाँ” पर खतम होता है

इसके आगे भी एक लय का एहसास होता है, जबकि यह स्पष्ट है कि यह छंदोबद्ध कविता नहीं है और होना भी नहीं चाह रही है। यह कौतुहल हुआ कि गीत-गतिरूप में देखें इस रचना को| यह लय का एहसास कहाँ से आ रहा है, कुछ और पता चलता है क्या।

तो कविता को गीत-गतिरूप में डालने से यह मिला

इससे कुछ लय बोध तो हो नहीं रहा| हर पंक्ति जितने मात्रा की है उसमें कुछ ठोस समानता नहीं दिख रही है| 12, 17, 10, 23 सभी प्रकार के अंक हैं| (गौर करें दाहिनी ओर के अंकों पर)

तो फिर पंक्तियों को जोड़ हर छंद में कुल मात्रा कितने हैं, वह देखते हैं –

अभी भी काफी असमानता है – 65, 56, 64, 76 | फिर भी 56, 64 में यह समानता है कि वह दोनों 8 के गुणज हैं (multiples of 8)| तो क्या रचना का मूल बहर 8 है?

चलिए मूल बहर के बॉक्स में 8 देकर देखते हैं –

मूल बहर के अनुसार पहले छंद में 1 मात्रा ज़्यादा है और चौथे छंद में 4 मात्रा ज़्यादा है|

यह बहुत ख़ास बात नहीं – उच्चारण में अक्सर हम कुछ दीर्घ स्वर लघु करके कहते हैं| जैसे, “तो कभी ठहरे तालाब सी लडकियां” को “तो कभी ठहरे तालाब सि लडकियां” उच्चारण करना काफी आम है| तो उस “सी” को एक मात्रा करने से छंद मूल बहर में बैठ जाता है|
(“सी” पर मैंने क्लिक किया तो वह सिकुड़ कर एक मात्रा का हो गया| जब जुड़ी हुई पंक्तियाँ मूल बहर के अनुकूल होती है तो अंक लाल में नहीं होता)

उसी प्रकार से आख़री छंद पढ़ते वक्त अपने उच्चारण पर गौर करती हूँ तो लगता है –
“पंख तो खोले थे परवाज़ नहीं दिखती” में “तो” स्वाभाविकता से छोटा उच्चारण कर रही हूँ|
वैसे ही “उड़ने को आतुर” में “को” छोटा उच्चारण कर रही हूँ| आख़री पंक्ति में फिर “सुरखाब सी लडकियां” में सी मैं सि उच्चारण कर रही हूँ|

तो कुल मिला कर आख़री छंद यूं बैठा –

एक मात्रा अभी भी ज़्यादा| पर कुछ तो स्पष्ट हुआ कि छन्दोबद्ध कविता नहीं है फिर भी लय का एहसास कहाँ से आ रहा है| शायद इस रचना को “कहारवा” ताल के किसी धुन में ढाला जा सकता है|

आपका क्या विचार है? क्या आप इस विश्लेष्ण से सहमत हैं, या रचना में निहित लय को क्या किसी और तरह से देखना चाहिए? किसी शब्द को या पंक्ति को क्या किसी और प्रकार से देखा जा सकता है? नीचे ज़रूर टिपण्णी दें जिससे कि हम सभी सीख पाएं|

मुक्त कविता की सुविधा

गीत गतिरूप में अब मुक्त-कविता में स्थित लय को परखने के लिए सुविधा उपलब्ध है। इस सुविधा के उपयोग की विधि है –

दोस्तों, गीत गतिरूप में अब मुक्त-कविता में स्थित लय को परखने के लिए सुविधा उपलब्ध है।

इस सुविधा का आधार काव्यालय का यह लेख है: Basic Structure of Hindi Poetry – Rhythm in Mukt Kavita. छंदबद्ध न होने पर भी प्रभावकारी मुक्त कविता में एक निहित छंद और लय होता है| लेख में कई उदाहरणों के साथ यही चर्चा की गई है| छंद के अलावा और किस प्रकार से कवि रचना में लय की अनुभूति दे सकता है, इसकी भी चर्चा की गई है|

मुक्त कविता की सुविधा का उपयोग की विधि

विधि बताने  के लिए हमने यहाँ विनोद तिवारी जी की कविता “जीवन दीप” के अंश का उपयोग किया है।

यह विशाल ब्रह्मांड
यहाँ मैं लघु हूँ
लेकिन हीन नहीं हूँ।
मैं पदार्थ हूँ
ऊर्जा का भौतिकीकरण हूँ।
नश्वर हूँ,
पर क्षीण नहीं हूँ।
मैं हूँ अपना अहम‌
शक्ति का अमिट स्रोत, जो
न्यूटन के सिद्धान्त सरीखा
परम सत्य है,
सुन्दर है, शिव है शाश्वत है।
मेरा यह विश्वास निरन्तर
मेरे मानस में पलता है।
मेरा एक दीप जलता है।

मुक्त कविता अनुरूप विश्लेषण के लिए, “मुक्त कविता” चेक बाक्स पर क्लिक करिए।

प्रतिरूप में हर पंक्ति के कुल मात्रा संख्या के करीब एक काली रेखा बनेगी।

जिन पंक्तियों को लय के अनुसार आप एक साथ रखना चाहते हैं, उन्हें सम्मिलित करने के लिए इस पास की काली रेखा पर क्लिक करें। पंक्ति नीचे वाली पंक्ति के संग जुड़ जाएगी, और दोनों पंक्तियों को मिलाकर कुल मात्रा संख्या कितनी होती है, वह दिखेगा।

लम्बी खड़ी काली रेखा पर क्लिक करके आप सम्मिलित पंक्तियों को पुन: अलग कर सकते हैं।

आपकी कविता मूल कितने बहर का अनुसरण करती है, यह नीचे “मूल बहर” में स्पष्ट करें – जैसे कि यह कविता “जीवन दीप” का मूल बहर १६ है। मूल बहर की संख्या देने से सम्मिलित पंक्तियों की मात्रा संख्या मूल बहर से कितना ज्यादा या कम है, वह लाल में स्पष्ट होगा।

इसके अनुसार, आप अपनी पंक्तियों में संशोधन कर सकते हैं, जैसा आपको उचित लगे। गीत गतिरूप में पहले से जो दीर्घ स्वरों को एक मात्रा निर्धारित करने की, और आधे अक्षरों की मात्रा तय करने की सुविधा है, उनका उपयोग आप अपनी मुक्त कविता की पंक्तियों में भी कर सकते हैं।

ऊपर उदाहरण में “ऊर्जा” शब्द के उच्चारण में “ऊजा” जितना वक्त ही लगता है (पांचवी पंक्ति: ऊर्जा का भौतिकीकरण हूँ)। अत: हम “आधा र” पर क्लिक करके उसे शून्य मात्रा निर्धारित करेंगे।

परिणाम:

मुक्त कविता में लय की भूमिका के विषय में और विस्तार से जानने के लिए यह लेख पढ़ें


कुछ दोस्तों ने गीत गतिरूप को अपने कम्प्यूटर पर उतारने की सुविधा का अनुरोध किया है। जिससे कि आप इन्टरनेट के बिना गीत गतिरूप का उपयोग कर सकें। इस पर काम ज़ारी है। जैसे ही सुविधा उपलब्ध हम यहाँ पोस्ट करेंगे, और जिन्होंने अपना ईमेल दर्ज किया है, उन्हे ईमेल भेजेंगे।

गीत गाता चल ओ साथी, गुनगुनाता चल!


Free Verse Support

A new feature available in Geet Gatiroop to analyse the rhythm that is present (or absent) in a free-verse poem. Here is an introduction to how to use this feature –

Friends, there is a new feature available in Geet Gatiroop to analyse the rhythm that is present (or absent) in a free-verse poem. The basis of this feature is the following article on Kaavyaalaya: Basic Structure of Hindi Poetry – Rhythm in Free Verse

How to use the Free Verse feature 

A portion of the poem “Jeevan Deep” by Vinod Tewary, has been used here for the examples.

यह विशाल ब्रह्मांड
यहाँ मैं लघु हूँ
लेकिन हीन नहीं हूँ।
मैं पदार्थ हूँ
ऊर्जा का भौतिकीकरण हूँ।
नश्वर हूँ,
पर क्षीण नहीं हूँ।
मैं हूँ अपना अहम‌
शक्ति का अमिट स्रोत, जो
न्यूटन के सिद्धान्त सरीखा
परम सत्य है,
सुन्दर है, शिव है शाश्वत है।
मेरा यह विश्वास निरन्तर
मेरे मानस में पलता है।
मेरा एक दीप जलता है।

To use the Free Verse feature, click the “Free Verse” checkbox below the generated visualization.

Short black lines will show up beside the maatraa count of every line.

To combine lines which go together as per meter, click the short black dash.

The line will be combined with the line below. The total maatraa count of the combined lines will be displayed. To disconnect lines, click on the vertical combining line.

You can specify the basic periodicity of your poem in the “Base Count” box below the visualization. For example, for this poem “Jeevan Deep” the periodicity is of 16 maatraas.

By giving the Base Count, you can see how off or within the periodicity is the total maatraa of the combined lines. If the total maatraa count is off the basic periodicity, it will be displayed in red, along with an indication of how many maatraas are missing or are extra.

Accordingly, you can edit the lines of your poem as you find appropriate. The earlier features of adjusting the maatraa allocation for deergh swar and half letters can also be used for your free verse.

For example, in this poem excerpt, the second set of combined lines is coming to 65 maatraas. This is 1 maatraa more than 64, which is a multiple of 16.

This is due to the word ऊर्जा in the 5th line (ऊर्जा का भौतिकीकरण हूँ). ऊर्जा takes equal amount of time to say as ऊजा। This means, the half र consumes zero maatraa here. We can set it to zero by clicking on the half र।

Result –

To know about the role of rhythm in free verse in greater detail, please read this article.


Some of you have asked for an offline version of Geet Gatiroop that you can download and use on your computer without the internet. We are working on this and as soon as it is ready, there will be a post here on this blog, and you will receive an email if you have subscribed for Geet Gatiroop updates.