मापनी (निर्धारित छंद में लिखना)

छंद में लिखने की पहली पायदान है कि पंक्तियों की कुल मात्रा संतुलित हो, पर पंक्ति के बीच में भी लघु दीर्घ स्वरों की संरचना से छंद का सौन्दर्य और गहराता है — खासकर पंक्ति के प्रारम्भ और अन्त में।

निर्धारित संरचना की मापनी देकर आप उसके अनुसार लिख सकते हैं। गीत गतिरूप आपको दिखाएगा कि आपकी पंक्ति मापनी के अनुकूल है कि उससे भटक रही है।

इसके लिए कविता की पहली पंक्ति में छंद की मापनी लिखें। जैसे मंदाक्रांता छंद की मापनी है —
2222 111112 2122122

अर्थात पंक्ति में मात्राओं की संरचना ऐसी होनी चाहिए। दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ अल्पविराम (यति) लघु-लघु-लघु… इत्यादि। मापनी में यति की जगह space दें।

कविता के बॉक्स में पहले मापनी लिखें फिर अपनी कविता की पंक्तियाँ और प्रतिरूप देखें। जैसे यहाँ धीरेन्द्र त्रिपाठी “कालपाठी” की कविता “एक लघु जीव से…” की दो पंक्तियों का उदाहरण दिया है —
तेरी मेरी विविध विधि है जीव संतोष की रे
दोनों तो हैं सुविकसित है दौड़ता कौन धीरे

प्रतिरूप ऐसे दिखेगा —

जिसमें दीर्घ लघु विराम की संरचना का दिए गए मापनी के संग मेल स्पष्ट दिख रहा है।

कविता की पंक्ति यदि मापनी के अनुकूल नहीं है तो वह भी प्रतिरूप में स्पष्ट हो जाता है। जैसे
2222 111112 2122122
आने जाने में लगता है समय बहुत ही रे

मापनी को आप हिन्दी के अंकों में भी लिख सकते हैं जैसे २२२२ १११११२ २१२२१२२

अनामी छंद भी

इस प्रकार, आप किसी भी छंद की मापनी दे सकते हैं। नामी छंद, या अनामी। कई बार कविता लिखते वक्त प्रारम्भिक पंक्तियाँ लय में होती हैं फिर आगे बढ़ते बढ़ते लय छूटता सा है। तो आप अपनी पंक्ति से ही मापनी बनाकर पहली पंक्ति में लिख सकते हैं।

जैसे विनोद तिवारी की कविता “प्यार का नाता” लें। यह किसी नामी छंद पर नहीं है (जहाँ तक हमें पता है)।
ज़िन्दगी के मोड़ पर यह प्यार का नाता हमारा।
राह की वीरानियों को मिल गया आखिर सहारा।
मैं तुम्ही को खोजता हूँ, चाँद की परछाइयों में।
बाट तकता हूँ तुम्हारी, रात की तनहाइयों में।
आज मेरी कामनाओं ने तुम्हे कितना पुकारा।

इसकी अपनी मापनी है जिसका हम प्रतिरूप देखर अनुमान लगा सकते हैं

प्रतिरूप और कविता की पंक्तियों को देखें तो स्पष्ट है कि इसकी मापनी है
21222122 21222122

यह मापनी देकर कविता की पंक्तियाँ देंखें —

साँस कहाँ लें?

रात को तो हम कभी न कभी सो ही जाते हैं नींद आने से*, पर दिन भर में भी थोड़ा ठहरने की, साँस लेने की आवश्यकता होती है।

वैसे ही निर्धारित छंद में मात्राओं का आकार तो निर्धारित होता ही है, साथ ही पंक्ति के बीच में अल्पविराम कहाँ हो, “यति” भी निर्धारित होता है। जैसे मंदाक्रांता छंद की मापनी 2222 111112 2122122 में दो स्थान पर यति अनिवार्य है — 2222 के बाद, और 111112 के बाद।

अब आपकी पंक्तियों में मापनी के अनुकूल यति होने पर गीत गतिरूप उसे मोटे नीले धारी में दिखाएगा। जैसे कविता के बॉक्स में यह लिखने से
2222 111112 2122122
तेरी मेरी विविध विधि है जीव संतोष की रे
दोनों तो हैं सुविकसित है दौड़ता कौन धीरे **

उसका प्रतिरूप ऐसा दिखेगा

* “सो ही जाऊँगा नींद आने से” ~ विनोद तिवारी की ग़ज़ल से

** कालपाठी की कविता “एक लघु जीव से…” से उद्धृत

इस सुविधा — मापनी और यति — के विषय में कोई भी प्रश्न, सुझाव, टिप्पणी हो तो अवश्य लिखें।

आधे अक्षर की मात्रा के नियम

ज्यादातर यह नियम लागू होते हैं। ज़रूरी नहीं 100% सभी शब्दों में लागू हो। इन नियमों के अनुसार गीत गतिरूप आधे अक्षर की मात्रा का अनुमान लगाता है, जिसे प्रयोगी बदल सकते हैं।

1. आधा अक्षर शब्द के आरम्भ में है: 0 मात्रा
उदाहरण –
प्यार — 3 मात्रा — या + र
क्रम — 2 मात्रा — र + म

2. आधा अक्षर शब्द के बीच में है, लघु स्वर के अक्षर के बाद: 1 मात्रा
उदाहरण –
हिन्दी — 4 मात्रा — हि + न् + दी
शब्द — 3 मात्रा — श + ब् + द

3. आधा अक्षर शब्द के बीच में है, दीर्घ स्वर के अक्षर के बाद: 0 मात्रा
उदाहरण –
आत्म — 3 मात्रा — आ + म

4. आधा अक्षर शब्द के बीच में है, दो दीर्घ स्वर के बीच: 1 मात्रा
उदाहरण –
आत्मा — 5 मात्रा — आ + त् + मा

5. आधा अक्षर शब्द के अन्त में है तो उसके पहले लघु या दीर्घ स्वर है उसके अनुसार नियम #2 या #3.

6. दो स्थिति में यह नियम नहीं लागू होते हैं — जब म्+ह या न्+ह हो, जैसे कि “तुम्ही” या “उन्हें”। ऐसे में आधे म् और न् की कोई मात्रा नहीं, वह ह के संग मिला है। तो “तुम्हे” = तु+हे = 3 मात्रा।

नाप कर माप कर! (मापनी)

कई दिनों से (बल्कि सालों से) मन में यह बात थी कि गीत गतिरूप में यह सुविधा होनी चाहिए| छंद की मापनी देकर उसके अनुसार कविता का प्रतिरूप पाने की सुविधा। एक बार मैंने कोशिश भी की, पर कोड करना जटिल लगा। मैंने छोड़ दिया।

हाल में कवि और गीत गतिरूप के प्रयोगी ( यूज़र), धीरेन्द्र त्रिपाठी ने कुछ सुझाव दिए जिससे कि यह महत्वपूर्ण सुविधा कोड करना काफ़ी सरल हो गया, और अब यह आपके लिए तैयार है।

काव्यशास्त्र और संगीत में सक्रिय रुचि रखने वाले धीरेन्द्र त्रिपाठी “कालपाठी” के नाम से लिखते हैं। विभिन्न छंदों की उनकी कविताएँ, यहाँ, उनके वेबसाइट पर, छंद की जानकारी सहित संकलित है। साथ ही व्यवसाय से वह प्रौद्योगिकी के सलाहकार भी हैं, तो उनकी ओर से यह सुझाव आए, आश्चर्य नहीं। इसके लिए उन्हें बहुत धन्यवाद।

कालपाठी की ही कविता “एक लघु जीव से…” की दो पंक्तियों के माध्यम से मापनी की यह सुविधा को जानें —

कविता के टेक्स्ट के पहले, प्रथम पंकित में अब आप छंद की मापनी लिख सकते हैं,
जैसे कि मंदाक्रांता छंद की मापनी
2222 111112 2122122
और उसके बाद कविता की पंक्तियाँ, जैसे कि
तेरी मेरी विविध विधि है जीव संतोष की रे
दोनों तो हैं सुविकसित है दौड़ता कौन धीरे

(कालपाठी)


और प्रतिरूप देखें तो यह पाएँगे —


यदि पंक्तियाँ मापनी के अनुकूल नहीं हैं तो प्रतिरूप में दिख जाएगा, जैसे कि —
2222 111112 2122122
आने जाने में लगता है समय बहुत ही रे


इस उदाहरण में कुल मात्रा एक से कम पड़ रहा है (27 की जगह 26) वह तो दिख ही रहा है, साथ ही रंगों के कारण छंद से पृथक पहली त्रुटि कहाँ है, और आगे के बेमेल भी स्पष्ट हो रहे हैं।


मापनी आप हिन्दी के १ २ में भी दे सकते हैं —
२२२२ १११११२ २१२२१२२

मापनी यदि न भी दें तो अब दीर्घ मात्रा और दो लगातार लघु मात्रा हरे में दिखते हैं और अकेला लघु हो तो नीले में। इससे बिन मापनी के भी छंद का आकार ज्यादा स्पष्ट होता है। इसके कारण तुकान्त पंक्तियों के रंग देखना अब अतिरिक्त विकल्पों में डाल दिया गया है —


सॉफ़्टवेयर अभी यति (छंद में विराम कहाँ अनिवार्य है) नहीं दिखाता है। वह प्रबन्ध और उसकी घोषणा बाद में कभी।

इस सुविधा के विषय में कोई भी प्रश्न अथवा टिप्पणी हो तो नीचे अवश्य लिखें।

नये रूप में गीत गतिरूप 7.0

गीत गतिरूप अब एक नए प्रयोग-आवरण (user interface) में उपलब्ध है। आशा है कि यह नया आवरण आपको ज्यादा आसान और स्वच्छ लगेगा — खासकर मोबाइल में प्रयोग करने के लिए।

क्योंकि यह बदलाव महत्वपूर्ण है, इस संस्करण को गीत गतिरूप 7.0 कहा गया है।

शुरुआत में ही, प्रवेश (लॉगिन) व सदस्य बनने के लिंक स्पष्ट उपलब्ध हैं —

प्रवेश करने पर आपकी पिछली रचनाएँ सबसे पहले दिखती हैं। नई रचना के लिए नीचे (+) बटन दबाएँ —

शुरुआत में ही आप चुन सकते हैं कि आप क्या लिखना चाहते हैं — नई कविता / ग़ज़ल / या मुक्त-कविता, जिससे कि उस विधा के अनुरूप सुविधाएँ सक्रिय रहें —

यदि एक विधा ठीक नहीं बैठ रही है, और आप दूसरी विधा के अनुसार अपनी रचना को देखना चाहते हैं तो वह विधा चुन कर हमेशा परिवर्तन कर सकते हैं —

प्रतिरूप का चित्र डाउनलोड करने की सुविधा नीचे उपलब्ध हो जाती है, जब प्रतिरूप दिखने लगता है —

शब्द सम्पदा ऊपर हमेशा उपलब्ध है —

आशा है कि इस नए रूप में गीत गतिरूप का प्रयोग आपके लिए और सरल होगा।

एप्प का आवरण बदलने से एक बार असुविधा लगती है। यदि आपको गीत गतिरूप के प्रयोग में कोई भी असुविधा महसूस हो तो हमें ज़रूर लिखें

अब प्रतिरूप डाउनलोड कर सकते हैं

अब जब गीत गतिरूप में (प्रतिरूप बटन दबाने पर) आपकी कविता का प्रतिरूप बने, तो आप उसे चित्र के जैसे डाउनलोड कर सकते हैं।

इसके लिए “🎨👇” बटन दबाएँ —

आपका फ़ोन पूछेगा कि चित्र कहाँ और किस नाम से डाउनलोड करना है। दीए हुए विकल्प को आप बदल सकते हैं अथवा उसी को स्वीकार सकते हैं।
हो सकता है कि आपके फ़ोन में डाउनलोड अलग प्रकार से काम करे।
कम्प्यूटर / लैपटॉप पर भी आप “🎨👇 ” दबाकर चित्र डाउनलोड कर सकते हैं।

डाउनलोड किए हुए चित्र का आप किसी भी प्रकार प्रयोग कर सकते हैं — शेयर कर सकते हैं, या कुछ और।

क्या आपको यह सुविधा किसी मतलब की लगी? बताइयेगा।

इस पोस्ट में उदाहरण स्वरूप, केदारनाथ अग्रवाल की कविता “बसंती हवा” की कुछ पंक्तियों का प्रयोग किया गया है।

सात घोड़ों पर सवार सपना

धर्मवीर भारती की एक मुक्त छंद कविता है जो मुझे बहुत पसन्द है। एक निहित लय का भी एहसास होता है। किन्तु लय की बात बाद में, पहले कविता का आनन्द लें —

क्योंकि

…… क्योंकि सपना है अभी भी –
इसलिए तलवार टूटे, अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशायें,
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धुंध-धूमिल,
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
…… क्योंकि है सपना अभी भी!

तोड़ कर अपने चतुर्दिक का छलावा
जबकि घर छोड़ा, गली छोड़ी, नगर छोड़ा,
कुछ नहीं था पास बस इसके अलावा,
विदा बेला, यही सपना भाल पर तुमने तिलक की तरह आँका था
(एक युग के बाद अब तुमको कहां याद होगा)
किन्तु मुझको तो इसी के लिए जीना और लड़ना
है धधकती आग में तपना अभी भी
…… क्योंकि सपना है अभी भी!

तुम नहीं हो, मैं अकेला हूँ मगर
यह तुम्ही हो जो
टूटती तलवार की झंकार में
या भीड़ की जयकार में
या मौत के सुनसान हाहाकार में
फिर गूंज जाती हो
और मुझको
ढाल छूटे, कवच टूटे हुए मुझको
फिर याद आता है कि
सब कुछ खो गया है – दिशाएँ, पहचान, कुंडल-कवच
लेकिन शेष हूँ मैं, युद्धरत् मैं, तुम्हारा मैं
तुम्हारा अपना अभी भी

इसलिए, तलवार टूटी, अश्व घायल,
कोहरे डूबी दिशाएँ,
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, सब कुछ धुंध-धूमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है अपना अभी भी
…… क्योंकि सपना है अभी भी!

~ धर्मवीर भारती

कैसी लगी कविता? अति-सशक्त है न? एक निहित लय का एहसास हुआ?

मैंने इसे गीत गतिरूप में डाल कर देखा तो पाया कि सात मात्राओं की लय पर बह रही है यह कविता। पता नहीं क्यों, पर कविता मेरे लिए और भी सुन्दर हो गई। देखिए इस चित्र में — लगभग हर पंक्ति 7 मात्राओं का कोई गुणज है (14, 21, 28 इत्यादि)। कुछ पंक्तियों को जोड़ने से उनकी संख्या 7 का गुणज बनती है। और यह सब उच्चारण में कोई फेर बदल के बिना। सच, लय कविता का अनिवार्य गुण है।

तुकांत पंक्तियाँ उभर रही हैं रंगों में

गीत गतिरूप में एक और वृद्धि — अब कविता में तुकांत पंक्तियों के तुक वाले अक्षर अलग रंग में उभर कर आएँगे

उदाहरण स्वरूप देखिए विख्यात कविता, केदारनाथ अग्रवाल की रचना “बसंती हवा” की कुछ पंक्तियाँ —

हवा हूँ, हवा मैं
बसंती हवा हूँ।

सुनो बात मेरी –
अनोखी हवा हूँ।
बड़ी बावली हूँ,
बड़ी मस्तमौला।
नहीं कुछ फिकर है,
बड़ी ही निडर हूँ।
जिधर चाहती हूँ,
उधर घूमती हूँ,
मुसाफिर अजब हूँ।

छन्द-मुक्त कविता में भी तुकांत पंक्तियाँ अलग से उभर कर आएँगी। छन्द-मुक्त कविता में भी लय और तुक की उपस्थिति से कविता और प्रभावकारी हो जाती है।

उदाहरण स्वरूप देखिए विनोद तिवारी की कविता “जीवन दीप” की कुछ पंक्तियाँ —

यह विशाल ब्रह्मांड
यहाँ मैं लघु हूँ
लेकिन हीन नहीं हूँ।
मैं पदार्थ हूँ
ऊर्जा का भौतिकीकरण हूँ।
नश्वर हूँ,
पर क्षीण नहीं हूँ।
मैं हूँ अपना अहम‌
शक्ति का अमिट स्रोत, जो
न्यूटन के सिद्धान्त सरीखा
परम सत्य है,
सुन्दर है, शिव है शाश्वत है।
मेरा यह विश्वास निरन्तर
मेरे मानस में पलता है।
मेरा एक दीप जलता है।

आशा है इस वृद्धि से आपको अपनी कविता का आकार सुगठित करने के लिए और प्रेरणा मिलेगी। गीत गतिरूप में आप अपनी कविता का प्रतिरूप तो देख ही सकते हैं, अन्य कुशल कवियों की कविता भी डाल कर प्रतिरूप देख सकते हैं। इससे हमारे सीखने समझने में बहुत वृद्धि होती है।

तो आपकी या किसी अन्य कवि की कविता पर इस नई सुविधा का असर देखने आईये गीत गतिरूप में। कुछ भी प्रश्न, सुझाव, अथवा टिप्पणी हो तो ज़रूर लिखें।

सृजन का यह शाश्वत संगीत

जिनकी शिक्षा के आधार पर गीत गतिरूप का निर्माण हुआ — वैज्ञानिक और कवि विनोद तिवारी का एक-मात्र काव्य संकलन “समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न” प्रकाशित हुआ है।

भौतिक विज्ञान के शोध कर्ता और काव्यालय के सम्पादक डॉ. विनोद तिवारी, कविता में विज्ञान और विज्ञान में कविता देखते हैं। बचपन से ही उन्होंने अपने अन्तर्मन को काव्य के माध्यम से अभिव्यक्त किया। 80 वर्ष की जीवन यात्रा के सभी सत्य और स्वप्न, यह पुस्तक उनकी अबतक की लगभग सभी कविताओं का संकलन है।

आप गीत गतिरूप का प्रयोग करते हैं, अर्थात आपको सुगठित अभिव्यक्ति की तलाश है। झरने जैसी बहती, सुकून देती यह कविताएँ आपको अवश्य पसन्द आएँगी। देखिए कुछ पंक्तियाँ, जिससे पुस्तक को शीर्षक मिला —

सृजन का यह शाश्वत संगीत,
तुम्हारे लिए तुम्हारा गीत।
समर्पित सत्य समर्पित स्वप्न,
तुम्ही को मेरे मन के मीत।
तुम्हारा है सारा आकाश,
संजो कर रखना यह वरदान।
तुम्हारी मधुर मधुर मुस्कान।

साथ ही वाणी मुरारका की मौलिक चित्रकारी।

चलो चमन में बहारों के ख़्वाब देखेंगे।
किसी कली को कहीं बेनक़ाब देखेंगे।
चलो ज़मीन की तारीकियों से दूर चलें
फ़लक के पार चलें आफ़ताब देखेंगे।

पाठक क्या कह रहे हैं?
अमृत खरे: अभिभूत करतीं दिव्य-भव्य कवितायें। मैं मैं न रहा| स्वयं कवि विनोद तिवारी हो गया| परकाया प्रवेश हो गया| यह निश्चित ही कवि और कविता की “सिद्धि” को सिद्ध करता है|

पूनम दीक्षित : यह एक काव्य-यात्रा है। मोतियों पर टहलते हुए पर टहलते हुए मंज़िल की ओर।

पधारिये —
और जानकारीपुस्तक की झलकी । उपलब्ध : एमज़ॉन भारत अन्तराष्ट्रीयकाव्यालय

उफ्फ, यह दादी की दाढ़ी (और कविता का लय) कैसे सँवारें?

दादी की याद आने के कितने बहाने हैं…

दोस्तो, हल्की फुल्की हँसी के लिए, महिलाओं की इस अनकही संघर्ष पर, बबीता माँधणा ने सीधी सरल कविता लिखी —

इतिहास खुद को दोहराएगा

इक दिन मेरी दादी बोली,
तुम सब मिल मुझे चिढ़ाते हो
‘दाढ़ी की अम्मा’ कहते हो।
हम कहते ‘डैडी की अम्मा’
वे सुनती ‘दाढ़ी की अम्मा’!
वह मुस्काईं और फिर कहा —
इस ठुड्डी में बाल आ गए,
इसीलिए मुझे चिढ़ाते हो
‘दाढ़ी की अम्मा’ कहते हो?
इक दिन ऐसा भी आएगा,
इतिहास खुद दोहराएगा।
पार जवानी आएगी तू,
बाल उगेंगे ठुड्डी पर जब,
सब ‘दाढ़ी की अम्मा’ कह कर,
दादी की याद दिलाएँगे
यूँ इतिहास दोहराएँगे।

इक दिन मेरी दादी बोली।

~ बबीता माँधणा

अब बाल चाहे सर के हों या ठुड्डी के, बिखरें न हों तो बेहतर है, है न? वही बात कविता के साथ भी है। यह कविता जब पहली बार लिखी गई, इस प्रकार थी —

एक दिन मेरी दादी बोली,
तुम सब मिल मुझे चिढ़ाते हो
‘दाढ़ी की अम्मा’ बुलाते हो…
हम कहते थे ‘डैडी की अम्मा’,
वे सुनती थी ‘दाढ़ी की अम्मा’
उन्होंने मुस्कराकर फिर कहा-
मेरी ठुड्डी में बाल आ गए,
इसलिए मुझे चिढ़ाते हो…
‘दाढ़ी की अम्मा’ बुलाते हो|
एक दिन ऐसा आएगा,
इतिहास खुद को दोहराएगा…
जब तुम बड़े हो जाओगे
तुम्हारी ठुड्डी में बाल उगेंगे,
सब तुम्हे भी ‘दाढ़ी की अम्मा’ बुलाएँगे…
और मेरी याद दिलाएँगे|

बाल पर दो चार बार कंघी चलाने से वे संवर जाते हैं। कवि अपनी पंक्तियों को कैसे संवारे? कविता का सौन्दर्य कई पहलूओं से उभरता है। उसमें से एक पहलू है लय। यहाँ लय सुधारने के लिए हमने गीत गतिरूप की सहायता ली। गीत गतिरूप में इस कविता का पहले ड्राफ़्ट का यह चित्र बना —

यहाँ हर अंक उस पंक्ति की कुल मात्रा है
और चित्र में स्पष्ट है कि कौन सा अक्षर कितनी मात्राओं का है

पाठक का मन “एक” को “इक” स्वत: ही पढ़ लेता है क्योंकि लय में बहना इतनी आसान प्रक्रिया है। तो “एक” के ए पर क्लिक कर हमने उसे छोटा कर दिया (इसलिए बॉक्स पीला है) और पहली दो पंक्तियाँ 16 मात्रा में हैं। 16 मात्रा, सबसे आसान लय, अक्सर गीत संगीत कविता में पाई जाती है।

पर अन्य पंक्तियों का क्या? वे सोलह के आस पास हैं, पर कंघी चलानी होगी। देखिए हर पंक्ति को कैसे बदला गया। यह उदाहरण है कि कविता में गद्यात्मक अभिव्यक्ति को कैसे पद्यात्मक बनाया जा सकता है, अक्सर अनावश्यक शब्द हटाए जा सकते हैं।

‘दाढ़ी की अम्मा’ बुलाते हो [17 मात्रा]
‘दाढ़ी की अम्मा’ कहते हो [16 मात्रा]

“बुलाते” को “कहते” में बदल दिया। अ की एक मात्रा होती है, आ के दो मात्रा। उसे कहने में दुगुना समय लगता है।

एक स्पष्टिकरण — गीत गतिरूप दूसरे शब्द नहीं सुझाता है। क्या संशोधन उपयुक्त होगा, वह कवि पर ही निर्भर है। हाँ समानार्थक शब्द खोजने की सुविधा “शब्द सम्पदा” उपलब्ध है।

हम कहते थे ‘डैडी की अम्मा’ [18 मात्रा]
वे सुनती थी ‘दाढ़ी की अम्मा’ [18 मात्रा]

हम कहते ‘डैडी की अम्मा [16 मात्रा]
वे सुनती ‘दाढ़ी की अम्मा’ [16 मात्रा]
(अनावश्यक “थे”, “थी” हटा दिए)

उन्होंने मुस्कराकर फिर कहा [17 मात्रा]
वह मुस्काईं और फिर कहा [16 मात्रा]
(“उन्होंने मुस्कराकर” बहुत गद्यात्मक है)

मेरी ठुड्डी में बाल आ गए [18 मात्रा]
इस ठुड्डी में बाल आ गए [16 मात्रा]

लिए मुझे चिढ़ाते हो [15 मात्रा]
सीलिए मुझे चिढ़ाते हो [16 मात्रा]

क दिन ऐसा आएगा [15 मात्रा]
क दिन ऐसा भी आएगा [16 मात्रा]

इतिहास खुद को दोहराएगा [18 मात्रा]
इतिहास खुद दोहराएगा [16 मात्रा]

जब तुम बड़े हो जाओगे [15 मात्रा]
पार जवानी आएगी तू [16 मात्रा]

तुम्हारी ठुड्डी में बाल उगेंगे [19 मात्रा]
बाल उगेंगे ठुड्डी पर जब [16 मात्रा]

सब तुम्हे भी ‘दाढ़ी की अम्मा’ बुलाएँगे [24 मात्रा]
सब ‘दाढ़ी की अम्मा’ कह कर [16 मात्रा]

और मेरी याद दिलाएँगे [17 मात्रा]
दादी की याद दिलाएँगे [16 मात्रा]

पश्चिम बंगाल हावड़ा निवासी, हिन्दी अध्यापिका बबीता माँधणा को धन्यवाद, इस बिल्कुल अलग विषय की रचना के लिए, और इस संशोधन यात्रा को साझा करने की अनुमति के लिए।